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शुक्रवार, 4 जून 2010

आदमी की खोज

आदमी होकर भी कई बार आदमी आदमी नहीं होता। आदमी जब आदमी नहीं होता तो आदमी पर संकट का कारण बनता है। बिरला ही कोई आदमी, आदमी होता है। फिर जो आदमी होता है वही आदमी पर आये संकट को दूर करने का माध्यम बनता है। दुनिया के जंगल में आदमी गुम हो गया है। आदमी होते हुए भी आदमी अपनी आदमीयत भूल गया है। यह वैसे ही है जैसे जंगल का कोई शेर अपने को गीदड़ समझ बैठा हो। उस अनन्त सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में आदमी अपनी क्षमताओं को भूल गया है। इस आदमी को नहीं मालूम कि उसमें कितनी शक्तिशाली ऊर्जा छिपी हुई है।
आदमी की इसी ऊर्जा को उजागर करने और उसे निज की सत्ता से परिचित कराने के लिए यह प्रयास है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. जरूरी थी आदमी की खोज। आदमी को आदमी से परिचय कराना ही बड़ा काम है।
    सर्वेश कुमार सिंह

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  2. आदमी क्यों बनाया गया
    परमेश्वर ने आदमी को इसलिये नहीं बनाया कि वह भी जानवरों की तरह उसी का दिया हुआ खाये और ऐश करे।उसे यदि इंद्रियलोलुप और पेटपालू लोगों का समूह ही बनाना था तो उसकी सृष्टि मे भांति भांति के जानवर क्या कम थे ? जानवरों की अपनी कोई प्रतिष्ठा नहीं, अपना कोई सिद्धांत नहीं, उनका तो केवल पेट होता हैं। पेट केलिये वे कुछ भी कर सकते हैं। आदमी भी यदि खुद को पेट तक ही सीमित रखता है तो वह भी जानवर ही तो है। परमेश्वर ने आदमी की रचना इसलिये की थी कि वह दूसरों के पेट की रक्षा करे। आदमी को परमेश्वर ने अपनी सहजता, सरलता, करूुणा और दयालुता का पात्र बनाने की चेष्टा की, पर आदमी ने उसकी उपेक्षा की। आदमी खुद को केवल अपने लिये ही सीमित कर रह गया। आदमी केवल अपने लिये संग्रह करता है और जानवरों की तरह दूसरों द्वारा किये गये संग्रह को हड़पने की चेष्टा करता है। आदमी की यही पशुता उसे आदमी बनने से वंचित कर रही है। आदमी दूसरा सबकुछ बनने के प्रयास में लगा हुआ है वह केवल आदमी बनने के प्रयास से कोसों दूर है। आदमी को आदमी बनने के लिये जीवन में कृतज्ञता का भाव आवश्यक है। जानवर किसी के प्रति कृतज्ञ नहीं होते, आदमी भी यदि उसके प्रति कृतज्ञ नहीं होता जिसका दिया हुआ जीवन वह उपयोग कर रहा है तो वह भी पशु ही तो है। विश्वसनीयता आदमी का गुण है जानवरों का नहीं। जानवर अपने गुण व स्वभाव पर अडिग हैं पर आदमी का कोई भरोसा नहीं। लोग घरों में जानवरों को बांध कर रखते हैं, विश्वास नहीं है कि लाख खिलाये पिलाये जाने के बाद भी वे आदमी के साथ खुद को संबद्ध रखेंगे। जानवर अपना स्वभाव नहीं छोड़ते पर आदमी ने छोड़ दिया। लाखों प्राणियों के बीच में उस महान रचनाकार ने आदमी को अपने ठिकाने के रूप में प्रस्तुत किया था। केवल आदमी को उसने वह शक्ति दी थी कि वह उसके रूप गुण व स्वभाव को समझ सके पर इस नादान आदमी ने अपना सारा समय दूसरा सब कुछ समझने में लगा दिया केवल परमेश्वर को समझने की चेष्टा नहीं की। धधकती आग से उठनेवाली लपटें भी अग्नि का ही रूप होती हैं, उनमे ंभी वही ज्वलनशीलता होती है।ं परंतु ये लपटें जब आग के गोले से ऊपर उठने के लिये उससे अपना संबंध तोड़ लेती हैं तो धुआं बन जाती हैं। फिर इस काले स्याह धुएं में ज्वलनशीलता भले हो पर उसमें अग्नि का प्रभाव नहीं रह पाता। आग के गोले से उठने वाली लपटें सुर्ख लाल होती हैं, वे अग्नि का स्वभाव भी धारण करती हैं, अग्नि का सम्मान भी प्राप्त करती हैंे। इसके विपरीत अग्नि के गोले से दूरी बना लेने के फलस्वरूप धुआं अपनी कालिमा के लिये तो बदनाम होता ही है वह अग्नि के गुण से भी वंचित हो जाता है। आग का रूप धारण करने के लिये लकड़ी को जलना पड़ता है। जलती लकड़ी ही अपनी लपट रखती है। धुआं तभी उठता है जब लकड़ी जलने की प्रक्रिया में होती है। पूरी तरह जली हुई लकड़ी कभी धुआं नहीं दंेती। तात्पर्य है कि जहां केवल धुआं है वहां आग नहीं है। किसी लकड़ी के गटटे पर यदि आग आग लिख दिया जाय अथवा उसके लटठे पर आग की लपटों के सुर्ख रंग चित्रित कर दिया जाये तो इतने मात्र से वह अग्नि के रूप में नहीं प्रस्तुत हो जायगी। वह आग जैसी दिखाई भले दे सकती है पर वह अग्नि के गुण नहीं आत्मसात कर सकती। आग के गुण तो वह तभी प्राप्त करेगी जब वह स्वयं धू धू कर जलेगी। आदमी भी तभी आदमी के गुण व स्वभाव को धारण कर सकेगा जब उसकी जड़ता भगवतकृपाग्नि से जलेगी। तभी उसके अंतःकरण में भगवान की करूणा का अवतरण होगा।

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