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शनिवार, 17 जुलाई 2010

शुक्रवार, 4 जून 2010

आदमी की खोज

आदमी होकर भी कई बार आदमी आदमी नहीं होता। आदमी जब आदमी नहीं होता तो आदमी पर संकट का कारण बनता है। बिरला ही कोई आदमी, आदमी होता है। फिर जो आदमी होता है वही आदमी पर आये संकट को दूर करने का माध्यम बनता है। दुनिया के जंगल में आदमी गुम हो गया है। आदमी होते हुए भी आदमी अपनी आदमीयत भूल गया है। यह वैसे ही है जैसे जंगल का कोई शेर अपने को गीदड़ समझ बैठा हो। उस अनन्त सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में आदमी अपनी क्षमताओं को भूल गया है। इस आदमी को नहीं मालूम कि उसमें कितनी शक्तिशाली ऊर्जा छिपी हुई है।
आदमी की इसी ऊर्जा को उजागर करने और उसे निज की सत्ता से परिचित कराने के लिए यह प्रयास है।